आरक्षण के खिलाफ 47 साल पहले भी उठा था बड़ा आंदोलन

75 हजार से ज्यादा किसानों-मजदूरों ने दी थीं गिरफ्तारियां

बागपत, 25 अगस्त 2026 । आरक्षण व्यवस्था के विरोध में करीब 47 साल पहले भी देश में बड़ा आंदोलन हुआ था। उस दौर में आरक्षण के खिलाफ आवाज उठाने के लिए बड़ी संख्या में किसान, मजदूर और विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े लोगों ने आंदोलन किया था। बताया जाता है कि आंदोलन के दौरान 75 हजार से अधिक लोगों ने गिरफ्तारियां दी थीं।

इतिहास के पन्नों में दर्ज यह आंदोलन 28 जुलाई, 1979 को दिल्ली के कंझावला गांव में शुरू हुआ था। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समिति के नेतृत्व में किसानों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। इस आंदोलन में करीब 75 हजार से अधिक किसानों और मजदूरों ने स्वेच्छा से गिरफ्तारियां दी थीं। लगभग 90 हजार लोग जेल भेजे गए थे। यह उस दौर के सबसे बड़े जन आंदोलनों में से एक माना जाता है जो किसानों द्वारा चलाया गया था। बात उस समय की है जब देश के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई थे और किसान संघर्ष समिति उनकी किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ आवाज उठा रही थी।

उस समय आरक्षण को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज थी। आंदोलनकारियों का तर्क था कि सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था को लेकर व्यापक स्तर पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। इसी मांग को लेकर कई स्थानों पर प्रदर्शन और गिरफ्तारी अभियान चलाए गए।

आंदोलन में किसानों और मजदूरों की भागीदारी को खास तौर पर महत्वपूर्ण माना गया। बड़ी संख्या में लोगों ने प्रशासन के सामने अपनी गिरफ्तारी दी और आरक्षण नीति के खिलाफ अपनी आपत्ति दर्ज कराई। उस दौर की यह घटना बताती है कि आरक्षण का मुद्दा दशकों से देश की राजनीति और सामाजिक विमर्श का अहम हिस्सा रहा है।

47 साल पुरानी इस घटना का जिक्र ऐसे समय में फिर सामने आ रहा है, जब आरक्षण को लेकर देश में बहस जारी है। अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक समूह आरक्षण की जरूरत, इसकी सीमा और इसके लाभार्थियों को लेकर अलग-अलग विचार रखते हैं।

आरक्षण का मुद्दा भारत के सामाजिक न्याय और समान अवसर से जुड़े प्रश्नों के साथ भी जुड़ा हुआ है। समर्थक इसे ऐतिहासिक सामाजिक असमानताओं को दूर करने का महत्वपूर्ण माध्यम मानते हैं, जबकि विरोधी पक्ष आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था और इसके प्रभाव को लेकर सवाल उठाता रहा है।

पुराने आंदोलनों का इतिहास यह दिखाता है कि आरक्षण को लेकर बहस नई नहीं है। समय के साथ परिस्थितियां और नीतियां बदली हैं, लेकिन आरक्षण का सवाल आज भी राजनीतिक और सामाजिक चर्चा के केंद्र में बना हुआ है।

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