लंबे ट्रायल के आधार पर दोषियों को राहत, सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल

नई दिल्ली,21 अक्टूबर 202 | सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चोट पहुंचाने के 2003 के एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर कड़ी टिप्पणी की है। हाईकोर्ट ने मुकदमे की लंबी अवधि का हवाला देते हुए दो दोषियों को प्रोबेशन पर रिहा कर दिया था। इसके बाद दोनों को जेल में एक दिन भी नहीं बिताना पड़ा। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को गलत सहानुभूति का उदाहरण बताते हुए कहा कि अदालतों ने पीड़ित की गंभीर चोटों और उसके साथ हुई परेशानी पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने आरोपियों को सरेंडर करने का निर्देश दिया है और इलाहाबाद हाईकोर्ट से मामले की नए सिरे से सुनवाई करने को कहा है। यह आदेश पीड़ित के भाई की अपील पर दिया गया।

सर्वोच्च कोर्ट ने कहा कि अदालतों ने पीड़ित के बारे में एक बार भी नहीं सोचा, उसे कितनी गंभीर चोट आई है, जिसका इलाज आज भी चल रहा है। अब, सुप्रीम कोर्ट ने 2003 के इस मामले में आरोपियों को सरेंडर करने का निर्देश दिया है और हाई कोर्ट से मामले की फिर से सुनवाई करने को कहा है।

आरोपी बिना एक दिन जेल की सजा काटे कैसे रिहा हुआ: SC

शीर्ष अदालत ने आगे कहा कि हम काफी हैरानी के साथ यह देख रहे हैं कि ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट ने मामले को कितनी लापरवाही से लिया। फिर चाहे वो संज्ञान लेने से लेकर ‘प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट’ के तहत आरोपियों की रिहाई तक का मामला हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी बिना एक दिन भी जेल काटे बच निकले, और ऐसा कानून की बड़ी-बड़ी व्याख्याओं के आधार पर दिखाई गई ‘गलत सहानुभूति’ की वजह से हुआ।

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