दिल्ली की लक्ष्मी योजना पर हाई कोर्ट सख्त
बोला- सांसद-विधायक की पसंद-नापसंद पर नहीं छोड़ी जा सकती पात्रता
नई दिल्ली, 25 अगस्त 2026 ।दिल्ली की लक्ष्मी योजना को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि किसी सरकारी योजना का लाभ सांसद या विधायक की व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। अदालत ने योजना के तहत लाभार्थियों के चयन में पारदर्शिता और निर्धारित नियमों का पालन सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
पहचान जांचने के हजारों तरीके
बेंच ने सरकार से सवाल किया कि लाभार्थियों की पहचान के लिए MP या MLA की मंजूरी आखिर क्यों जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि आप इससे क्या हासिल करना चाहते हैं? मान लीजिए आप किसी MP या MLA को नहीं जानते? अगर इस शर्त की वजह से एक भी व्यक्ति छूट जाता है, तो यह योजना मनमानी है। लोगों की पहचान और पात्रता जांचने के हजारों तरीके हो सकते हैं।
10 दिनों के अंदर मांगा जवाब
लक्ष्मी योजना के तहत लाभ लेने के लिए सांसद या विधायक की मंजूरी अनिवार्य किए जाने पर उठे सवाल का जवाब दिल्ली सरकार ने तय समय के भीतर नहीं दिया। इस पर हाई कोर्ट ने सोमवार को नाराजगी जाहिर की। चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की बेंच ने सरकार से कहा कि एक भी लाभार्थी को सांसद या विधायक की पसंद या नापसंद के भरोसे छोड़ने की इजाजत नहीं दी जा सकती। राज्य सरकार के 2 मिनट अनुरोध पर हाई कोर्ट ने जवाब के लिए 10 दिनों का वक्त दिया और तार्किक जवाब के साथ हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है।
हाई कोर्ट की यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसमें योजना के लाभार्थियों को लेकर प्रक्रिया और चयन के तरीके पर सवाल उठाए गए थे। अदालत ने संकेत दिया कि सरकारी योजनाओं का लाभ नागरिकों को तय मानदंडों के आधार पर मिलना चाहिए और किसी जनप्रतिनिधि की व्यक्तिगत सिफारिश या पसंद को निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता।
अदालत ने कहा कि सार्वजनिक योजनाओं में पात्रता और लाभ देने की प्रक्रिया स्पष्ट एवं वस्तुनिष्ठ होनी चाहिए। यदि किसी योजना के लिए नियम और पात्रता तय हैं तो संबंधित अधिकारियों को उन्हीं मानकों के आधार पर निर्णय लेना होगा।
दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी के बाद लक्ष्मी योजना के क्रियान्वयन और लाभार्थियों के चयन की प्रक्रिया पर ध्यान बढ़ गया है। अदालत का रुख इस बात की ओर भी इशारा करता है कि सरकारी सहायता योजनाओं में राजनीतिक या व्यक्तिगत प्रभाव की संभावना को खत्म करने के लिए संस्थागत व्यवस्था जरूरी है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित पक्षों से योजना के नियमों और लाभार्थियों के चयन की प्रक्रिया को लेकर स्थिति स्पष्ट करने को कहा। आगे की सुनवाई में योजना के क्रियान्वयन से जुड़े अन्य पहलुओं पर भी तस्वीर साफ हो सकती है।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में पारदर्शिता और समान अवसर के लिहाज से अहम माना जा रहा है। इससे यह संदेश भी गया है कि किसी भी सार्वजनिक योजना का लाभ व्यक्तिगत राजनीतिक पसंद-नापसंद के आधार पर नहीं, बल्कि निर्धारित पात्रता और नियमों के अनुसार दिया जाना चाहिए।
हाई कोर्ट की यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसमें योजना के लाभार्थियों को लेकर प्रक्रिया और चयन के तरीके पर सवाल उठाए गए थे। अदालत ने संकेत दिया कि सरकारी योजनाओं का लाभ नागरिकों को तय मानदंडों के आधार पर मिलना चाहिए और किसी जनप्रतिनिधि की व्यक्तिगत सिफारिश या पसंद को निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता।
अदालत ने कहा कि सार्वजनिक योजनाओं में पात्रता और लाभ देने की प्रक्रिया स्पष्ट एवं वस्तुनिष्ठ होनी चाहिए। यदि किसी योजना के लिए नियम और पात्रता तय हैं तो संबंधित अधिकारियों को उन्हीं मानकों के आधार पर निर्णय लेना होगा।
दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी के बाद लक्ष्मी योजना के क्रियान्वयन और लाभार्थियों के चयन की प्रक्रिया पर ध्यान बढ़ गया है। अदालत का रुख इस बात की ओर भी इशारा करता है कि सरकारी सहायता योजनाओं में राजनीतिक या व्यक्तिगत प्रभाव की संभावना को खत्म करने के लिए संस्थागत व्यवस्था जरूरी है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित पक्षों से योजना के नियमों और लाभार्थियों के चयन की प्रक्रिया को लेकर स्थिति स्पष्ट करने को कहा। आगे की सुनवाई में योजना के क्रियान्वयन से जुड़े अन्य पहलुओं पर भी तस्वीर साफ हो सकती है।
हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं में पारदर्शिता और समान अवसर के लिहाज से अहम माना जा रहा है। इससे यह संदेश भी गया है कि किसी भी सार्वजनिक योजना का लाभ व्यक्तिगत राजनीतिक पसंद-नापसंद के आधार पर नहीं, बल्कि निर्धारित पात्रता और नियमों के अनुसार दिया जाना चाहिए।