नई दिल्ली, 28 अक्टूबर 2026 | पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस संजय किशन कौल ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर अहम बयान दिया है। उन्होंने कहा कि 1950 के दशक से ही सत्ता में रही सरकारें ऐसे जजों को पसंद करती रही हैं, जिनके विचार और सिद्धांत सरकार की सोच से मेल खाते हों। जस्टिस कौल के मुताबिक, ऐसी परिस्थितियों में न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने की जिम्मेदारी खुद जजों की है। उनका यह बयान न्यायपालिका और कार्यपालिका के संबंधों तथा कॉलेजियम प्रणाली में सरकार की भूमिका को लेकर चल रही बहस के बीच आया है।
पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ के न्यायिक नियुक्तियों के दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए कौल ने कहा कि कॉलेजियम को स्वतंत्र रूप से फैसले लेने चाहिए और सरकार से पहले ही मंजूरी लेने से बचना चाहिए। उन्होंने ये बातें अपनी आगामी किताब ‘विदाउट फियर ऑर फेवर’ को लेकर चर्चा के दौरान कहीं।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय किशन कौल ने स्पष्ट किया है कि वह कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास को मेंटर नहीं कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वह उनसे एक पत्रकार के रूप में केवल कुछ बार मिले थे और उन्हें अपनी भाषा में थोड़ा संयम बरतने की सलाह दी थी, जो कि अक्सर पीढ़ियों के बीच अलग-अलग होती है।
अनुच्छेद 370 हटाने पर: अनुच्छेद 370 हटाने के मामले में फैसला देते समय उन्होंने खुद को कश्मीरी हिंदू नहीं, बल्कि एक संवैधानिक जज माना। उनके परिवार ने 1947 के बंटवारे का दर्द झेला था, लेकिन न्याय करते समय निजी अनुभवों को फैसले पर हावी नहीं होने दिया। दिसंबर 2023 में वह उस पांच जजों की संविधान पीठ का हिस्सा थे, जिसने अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को बरकरार रखा था।
जम्मू-कश्मीर में हिंसा पर: जम्मू-कश्मीर में लंबे समय से हुई हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाओं को स्वीकार करना जरूरी है। उन्होंने राज्य और गैर-राज्य पक्षों की ओर से हुए उल्लंघनों की जांच के लिए एक निष्पक्ष सत्य एवं सुलह आयोग बनाने का सुझाव दिया था। उनके मुताबिक, पीड़ितों को न्याय और मानसिक शांति देने के लिए गलतियों को स्वीकार करना जरूरी है।
राफेल विमान सौदे पर: राफेल विमान सौदे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि रक्षा सौदों में सरकार के फैसलों की जगह अदालत अपना फैसला नहीं थोप सकती। वहीं, कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास के साथ वायरल तस्वीर पर उन्होंने स्पष्ट किया कि यह एक साल पुरानी दिवाली मुलाकात की तस्वीर थी। इसका दास की पार्टी या उसकी विचारधारा से जुड़ाव नहीं था।
कॉलेजियम की स्वतंत्रता पर क्यों हुई बहस?
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम वरिष्ठ न्यायाधीशों का समूह है, जो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में जजों की नियुक्ति तथा पदोन्नति के लिए नामों की सिफारिश करता है। नियुक्तियों में सरकार की भूमिका और कॉलेजियम की सिफारिशों पर निर्णय लेने में होने वाली देरी लंबे समय से बहस का विषय रही है।
जस्टिस कौल ने अपनी पुस्तक में एक बैठक का उल्लेख किया है, जिसमें उनके अनुसार पांच नामों पर सहमति बन चुकी थी, लेकिन छठे नाम को लेकर मतभेद सामने आया। उन्होंने सवाल उठाया कि कॉलेजियम को सरकार से पहले ही मंजूरी लेने की जरूरत क्यों होनी चाहिए।
उनका तर्क है कि सरकार और न्यायपालिका के बीच संवाद जरूरी है, लेकिन नियुक्तियों के संबंध में अंतिम सिफारिश तैयार करने से पहले कॉलेजियम को स्वतंत्र रूप से विचार करना चाहिए।
जस्टिस चंद्रचूड़ ने क्या प्रतिक्रिया दी?
जस्टिस कौल के संस्मरण में किए गए दावों पर पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि पुस्तक को पढ़े और टिप्पणियों का संदर्भ समझे बिना वह विस्तृत प्रतिक्रिया देने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कॉलेजियम के आधिकारिक रिकॉर्ड में सिफारिशों और उनके कारणों को सार्वजनिक किया गया था तथा प्रस्तावों पर सहमति दर्ज थी।
इसलिए जस्टिस कौल के संस्मरण में दिए गए विवरण को उनके व्यक्तिगत अनुभव और दृष्टिकोण के रूप में देखना जरूरी है। इस मामले में दोनों पूर्व न्यायाधीशों के बयानों और उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड को अलग-अलग समझना महत्वपूर्ण है।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर फिर चर्चा
जस्टिस कौल के बयान ने एक बार फिर यह सवाल उठाया है कि जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार और न्यायपालिका के बीच संतुलन कैसे कायम रखा जाए। न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण मानी जाती है, जबकि नियुक्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही भी जरूरी हैं।
जस्टिस कौल का कहना है कि जजों को संस्थागत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपने रुख पर कायम रहना चाहिए। उनके बयान का केंद्र यही है कि सरकार से संवाद हो सकता है, लेकिन न्यायिक नियुक्तियों में कॉलेजियम की स्वतंत्र भूमिका कमजोर नहीं पड़नी चाहिए।