नई दिल्ली, 26 अक्टूबर 2026 | संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की सिविल सेवा परीक्षा 2025 में सफल हुए 958 उम्मीदवारों की सर्विस अलॉटमेंट और ट्रेनिंग प्रक्रिया पर OBC क्रीमीलेयर नियमों को लेकर कानूनी असमंजस का असर पड़ा है। आमतौर पर अगस्त के आखिरी सप्ताह में शुरू होने वाला फाउंडेशन कोर्स अब तक शुरू नहीं हो सका है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से मार्च 2026 के फैसले को लागू करने के तरीके पर स्पष्टता मांगी है। अदालत में इस मामले पर फैसला सुरक्षित है, जिसके चलते चयनित अभ्यर्थियों को अपनी सेवा और ट्रेनिंग की औपचारिक जानकारी का इंतजार करना पड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च को ओबीसी क्रीमीलेयर के नियमों को लेकर एक फैसला दिया था। इसके बाद यह भ्रम पैदा हो गया है कि यह नियम केवल नई भर्तियों पर लागू होगा या पुरानी भर्तियों पर भी। इसका असर ये हुआ कि आईएएस अफसरों की ट्रेनिंग दो महीनों से अटकी हुई है। इसे अगस्त के तीसरे हफ्ते से शुरू होना था।
कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने रविवार शाम इसे लेकर एक नोट जारी किया। इसमें बताया कि सरकार चाहती है कि सुप्रीम कोर्ट यह साफ करे कि इस फैसले को कैसे लागू करना है। विभाग ने सिविल सेवा परीक्षा के 14 सालों के उम्मीदवारों के आंकड़े जुटाकर विभिन्न पहलुओं का आकलन किया है।
इसे लेकर केंद्र सरकार ने 24 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इस पर कोर्ट ने 24 सितंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था, जो अभी तक लंबित है।
958 चयनित उम्मीदवारों की ट्रेनिंग क्यों अटकी?
UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 का परिणाम 6 मार्च 2026 को घोषित हुआ था। इसके बाद 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने OBC क्रीमीलेयर निर्धारित करने से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया। इस फैसले के बाद केंद्र सरकार के सामने यह सवाल खड़ा हुआ कि नए निर्देशों को पहले से पूरी हो चुकी चयन प्रक्रिया पर किस तरह लागू किया जाए।
सिविल सेवा परीक्षा में सफल उम्मीदवारों की सर्विस अलॉटमेंट के बाद ही उनकी संबंधित सेवाओं और ट्रेनिंग संस्थानों की प्रक्रिया आगे बढ़ती है। इसी वजह से 2025 बैच के 958 चयनित उम्मीदवारों का फाउंडेशन कोर्स भी निर्धारित समय पर शुरू नहीं हो पाया।
सुप्रीम कोर्ट ने OBC क्रीमीलेयर पर क्या कहा था?
11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि OBC उम्मीदवारों के क्रीमीलेयर दर्जे का निर्धारण केवल माता-पिता की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। माता-पिता का पद, उनकी सेवा की प्रकृति और संबंधित नियम भी महत्वपूर्ण हैं।
मामले में सवाल यह था कि सरकारी कर्मचारियों और निजी कंपनियों या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU) में काम करने वाले माता-पिता के बच्चों के लिए क्रीमीलेयर निर्धारित करने में अलग-अलग मानदंड कैसे लागू किए जा सकते हैं। अदालत ने समान स्थिति वाले उम्मीदवारों के साथ अलग व्यवहार को लेकर चिंता जताई थी।
इस फैसले का उद्देश्य OBC आरक्षण के पात्र उम्मीदवारों के लिए क्रीमीलेयर मानदंडों को समानता के सिद्धांत के अनुरूप लागू करना है। हालांकि, पहले से पूरी हो चुकी भर्तियों पर इसके प्रभाव को लेकर अब भी स्पष्टीकरण की जरूरत बनी हुई है।
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से क्या मांगा?
केंद्र सरकार ने 24 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दाखिल कर फैसले के क्रियान्वयन को लेकर स्पष्ट निर्देश मांगे थे। सरकार का कहना है कि नियमों को पिछली भर्तियों पर लागू करने से पहले से निर्धारित नियुक्तियों, वरिष्ठता, कैडर आवंटन और सेवा शर्तों पर असर पड़ सकता है।
केंद्र ने अदालत से यह भी अनुरोध किया कि नियमों को लागू करने के लिए उचित समय दिया जाए। सरकार ने पदों की समकक्षता तय करने और अलग-अलग क्षेत्रों में समान मानदंड तैयार करने के लिए दो साल या उससे अधिक का समय देने की मांग रखी थी।
24 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। 26 अक्टूबर तक इस मामले में अंतिम आदेश सामने नहीं आया था। इसलिए सेवा आवंटन और ट्रेनिंग शुरू करने को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है।
क्या पुराने उम्मीदवारों को भी मिल सकता है फायदा?
इस मामले का असर केवल 2025 बैच तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। रिपोर्टों के मुताबिक, पिछले वर्षों में करीब 100 ऐसे उम्मीदवार भी हैं, जिनकी OBC पात्रता को क्रीमीलेयर मानदंडों के आधार पर अस्वीकार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उनकी पात्रता पर दोबारा विचार किए जाने का सवाल उठ रहा है।
यदि पुराने मामलों की समीक्षा होती है, तो कुछ उम्मीदवारों की मेरिट स्थिति या सेवा आवंटन प्रभावित हो सकता है। दूसरी ओर, पहले से नियुक्त अधिकारियों की वरिष्ठता और सेवा शर्तों पर असर पड़ने की आशंका भी केंद्र सरकार ने अदालत के सामने रखी है। इन मामलों में अंतिम स्थिति सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और सरकार द्वारा बनाए जाने वाले नियमों पर निर्भर करेगी।
क्या ट्रेनिंग में देरी से वरिष्ठता प्रभावित होगी?
कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के अधिकारियों ने 25-26 अक्टूबर को बताया कि फाउंडेशन कोर्स में देरी से 2025 बैच के उम्मीदवारों की वरिष्ठता, ग्रेडेशन या अन्य सेवा शर्तों पर असर नहीं पड़ेगा। विभाग और प्रशिक्षण संस्थान सर्विस अलॉटमेंट को जल्द पूरा करने तथा ट्रेनिंग शुरू करने के लिए तैयार हैं। हालांकि, इसके लिए सुप्रीम कोर्ट से जरूरी स्पष्टता का इंतजार है।
फाउंडेशन कोर्स मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA) में आयोजित किया जाता है। इसमें नए अधिकारियों को संविधान, प्रशासनिक व्यवस्था, सार्वजनिक नीति और सरकारी कामकाज से जुड़ा प्रशिक्षण दिया जाता है।
फिलहाल, 958 चयनित उम्मीदवारों की सर्विस अलॉटमेंट और फाउंडेशन कोर्स शुरू होने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जुड़ी हुई है। अदालत के स्पष्टीकरण के बाद केंद्र सरकार को यह तय करना होगा कि क्रीमीलेयर संबंधी नए मानदंडों को मौजूदा चयन प्रक्रिया और पुराने मामलों में किस तरह लागू किया जाए।
यह मामला OBC आरक्षण के नियमों, समानता के सिद्धांत और पहले से पूरी हो चुकी भर्ती प्रक्रियाओं के बीच संतुलन से जुड़ा है। उम्मीदवारों के लिए अगला महत्वपूर्ण कदम सुप्रीम कोर्ट का आदेश और उसके बाद DoPT की ओर से जारी होने वाले निर्देश होंगे।