NDA में बदला शक्ति संतुलन: नीतीश-नायडू की घटती निर्णायक भूमिका के बीच मोदी सरकार 300 के पार

पटना/दिल्ली , 17 जून्‌ 2026 । राष्ट्रीय राजनीति में एक समय ऐसा था जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू को केंद्र की सत्ता के प्रमुख ‘किंगमेकर’ के रूप में देखा जाता था। लोकसभा चुनाव के बाद गठबंधन की मजबूरियों के कारण इन दोनों नेताओं की राजनीतिक अहमियत काफी बढ़ गई थी। लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरणों और उपचुनावों तथा सहयोगी दलों के नए समर्थन के बाद केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की स्थिति पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत दिखाई दे रही है।

टीएमसी के 20 सांसदों के बागी होकर एनडीए में शामिल होने से भारतीय जनता पार्टी बैसाखियों के सहारे से पूरी तरह मुक्त हो गई। अब केंद्र की मोदी सरकार 300 के पार पहुंच चुकी है। इस नए अपडेट के बाद जदयू प्रमुख नीतीश कुमार और टीडीपी चीफ चंद्रबाबू नायडू की ‘बार्गेनिंग पावर’ और ‘किंगमेकर’ वाली ताकत नहीं रही। अब अगर ये दोनों दल केंद्र सरकार से समर्थन वापस भी ले लें, तब भी मोदी सरकार संसद में पूरी तरह सुरक्षित रहेगी।

अब 300 के पार मोदी सरकार

2024 के लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र की सत्ता के समीकरण बैसाखियों पर टिके नजर आ रहे थे, जो अब पूरी तरह बदल चुके हैं। बागियों ने मोदी सरकार की मुराद पूरी कर दी।

  • 2024 के चुनाव में बीजेपी को 240 सीटें मिली थीं, जो बहुमत (272) से 32 सीटें कम थीं।
  • सरकार चलाने के लिए टीडीपी के 16 और जदयू के 12 सांसदों समेत 11 अन्य पार्टियों के 24 सांसदों (कुल 282 सांसद) का समर्थन हासिल था।
  • अब टीएमसी से अलग हुए 20 बागी सांसदों (NCPI) के एनडीए में आने से अब कुल आंकड़ा 312 पर पहुंच गया है, जो बहुमत से 40 ज्यादा है।
  • जदयू और टीडीपी दोनों भी समर्थन वापस ले लें, तो भी एनडीए के पास 284 सांसद बचेंगे, जो बहुमत के आंकड़े से 12 अधिक हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद में संख्या बल बढ़ने और सहयोगी दलों के बीच नए समीकरण बनने से एनडीए सरकार अब पहले जैसी निर्भरता की स्थिति में नहीं है। ऐसे में नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू की वह निर्णायक भूमिका, जो सरकार गठन के शुरुआती दौर में दिखाई दे रही थी, अब अपेक्षाकृत कमजोर पड़ती नजर आ रही है।

मोदी सरकार के समर्थन में सांसदों की संख्या 300 के आंकड़े को पार करने की चर्चा ने विपक्ष की रणनीति को भी प्रभावित किया है। विपक्ष लगातार यह दावा करता रहा है कि गठबंधन की राजनीति में सहयोगी दल सरकार पर दबाव बना सकते हैं, लेकिन हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों ने इस धारणा को चुनौती दी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि केंद्र सरकार का संख्या बल लगातार मजबूत बना रहता है, तो बड़े नीतिगत फैसलों और विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने में उसे पहले की तुलना में अधिक सुविधा मिल सकती है। वहीं, सहयोगी दलों की राजनीतिक उपयोगिता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन उनकी सौदेबाजी की क्षमता पहले जैसी प्रभावशाली नहीं रह गई है।आने वाले समय में संसद के भीतर और राज्यों की राजनीति में होने वाले बदलाव यह तय करेंगे कि एनडीए के भीतर शक्ति संतुलन किस दिशा में जाता है। फिलहाल संकेत यही हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार अपनी राजनीतिक स्थिति को पहले से अधिक सुरक्षित और मजबूत मान रही है।

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